Sunday, October 24, 2021

कभी एक दिन के मिलते थे 15 रुपये, भारती सिंह ने नमक रोटी खाकर किया है गुजारा, जानें

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Bharti Singh: टेलीविजन की दुनिया में भारती सिंह का नाम उनकी जबरदस्त कॉमेडी के लिए लिया जाता है। वो आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। भारती दर्शकों को अपने चुटकुलों से गुदगुदाकर सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच रही हैं। हालांकि, उनकी कामयाबी का ये सफर इतना आसान नहीं रहा है। एक वक्त ऐसा था जब उनका जीवन तंगहाली के दौर में गुजर रहा था। आइए जानते हैं उनसे जुड़ी खास बातें –

अपनी हंसी से दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाली भारती सिंह ने अपने अंदर गमों का पहाड़ छुपाया हुआ है। हाल में ही एक्टर और होस्ट मनीष पॉल के पॉडकास्ट के पहले एपिसोड में बतौर मेहमान भारती सिंह नजर आ रही हैं। इस प्लैटफॉर्म पर भारती सिंह ने अपने जीवन के कई राज खोलें।

आर्थिक कठिनाइयों से जूझा है बचपन: इस पॉडकास्ट में भारती ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताया था कि शुरुआत में उन्होंने काफी गरीबी झेली है। जब भारती 2 साल की थीं तब उनके पिता गुजर गए, इसके बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई। उन्होंने बताया कि मां ने फैक्ट्री में काम करके बच्चों को पाला था। कई बार तो ऐसा भी होता था कि एक वक्त का खाना भी परिवार को मुश्किल से मिल पाता था।

नमक रोटी खाकर किया गुजारा: उन्होंने बताया कि अभी भी उनके परिवार को आलीशान जीवन जीने की आदत नहीं हुई है। भारती सिंह कहती हैं कि उनकी मां फैक्ट्री में कंबल सिलती थीं और घर पर दुर्गा मां के डिजाइन वाली चुन्नी भी सिला करती थीं। इस वजह से घर से हमेशा मशीन के चलने की आवाज आती रहती थी। वो बताती हैं कि एक समय था जब उन्होंने रोटी के साथ नमक खाकर गुजारा किया है।

रह चुकी हैं नेशनल लेवल शूटर: मनीष पॉल को भारती सिंह ने बताया कि बेशक आज उनके फिगर को देखकर कोई इस बात पर यकीन नहीं करेगा, लेकिन वो राइफल शूटर रह चुकी हैं। वो कहती हैं कि 12 साल पहले उन्होंने नेशनल लेवल पर पंजाब टीम की ओर से खेल में हिस्सा लिया था।

रोज के मिलते थे 15 रुपये: अपने हालातों के बारे में बात करते हुए भारती कहती हैं कि खेल के दौरान उन्हें सरकार की तरफ से मुफ्त का खाना मिलता था। उस समय भारती को रोजाना के 15 रुपये मिलते थे। साथ ही, 5 रुपये के कूपन भी दिये जाते थे जिससे वो जूस पीती थीं ताकि उन्हें शूटिंग के दौरान लगातार खड़े रहने की ताकत मिले। वो कहती हैं कि बाकी कूपन वो बचाकर महीने की आखिरी में उससे फल और जूस खरीदती थीं और घर लेकर जाती थीं।



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