Thursday, October 28, 2021

ठहराव से अच्छा है अपने लिए जीना

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दीप्ति अंगरीश

गुजरी उम्र का हर पल, हर क्षण, हर महीना, हर साल….कितना हसीन लगता है। पर हमेशा नहीं। वक्त गुजर जाने के बाद। याद करें अपना बचपन। जब कोई भी, कैसी भी जिद हो, रो-धोकर पूरी हो जाती थी। अधिकांश बच्चे ऐसे ही होते हैं। राजा की तरह जीते हैं, पर मन उनका टीसता रहता है कि काश! हम बड़े होते तो सब पर रौब जमाते।

कुछ ऐसे भी होते हैं। बचपन में ही साठ वालों की सोच रखते हैं। ना कोई जिद, ना कोई चुलबुलाहट। ऐसे बच्चे मां-बाप को बहुत पसंद होते हैं। लेकिन, उन्हें नहीं पता कि अनजाने में वे उनसे क्या कुछ छीन लेते हैं। अच्छी-अच्छी बातें तो बहुत सिखाईं। उम्दा संस्कार दिए। सब ठीक है, पर इसकी अति बच्चों के कोमल मन के लिए घातक है। मेरे जैसे भोंदू बच्चों के लिए बालमन की सरेआम हत्या। एक मनोवैज्ञानिक ने कहा था कि बच्चों को अपने स्कूल और घर में बदमाशी करनी चाहिए। वह उसके बचपना का परिचायक होता है। अब, बदमाशियां बच्चा नहीं करेगा तो क्या घर के बुजुर्ग करेंगे !!!

यदि कोई ऐसा रहा हो, फिर खोजिए आप बच्चे में बच्चा। ठेंगा मिलेगा आपको। मां-बाप तो खुश, पर कोमल मन में डाल दिया संस्कारों का बोझ। जब थोड़े बड़े हुए तो जिम्मेदारियां सामने आने लगीं, तब बचपन ही सुहाता था। याद आते थे वो दिन, मस्त रहते हुए चुप रहना। लेकिन अब कहां थे वे दिन और बच्चे खेलते, मौज मस्ती करते वो छोटी उम्र में कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ। ऐसे ही दिन बीतते रहे। और कुछ बड़े होने पर गुजरे वक्त की यादें ताजा होती रहीं।

मन हमेशा चाहता था कि काश! पुराने दिन लौट आएं। ऐसे करते-करते तैंतीस वर्ष बीत गए। अब अकेलापन काटने को दौड़ता है। अब लगता है बचपन से आजतक तो सिर्फ अपनों के लिए ही जीए। चाहे उम्र का दौर कोई भी रहा हो। बता दूं ये राह आसन नहीं थी कभी भी। अपने मन को हर बार दूसरों की खुशी के लिए मारना आसान नहीं होता। इसकी वजह बचपन में बोए संस्कारों के बीज हैं। इन्होंने जीना नहीं सिखाया, अपितु बिगाड़ दिया। ये गलत नहीं सच है। कई बार लगता है कि बच्चे में सबको बदमाशी करनी चाहिए। असल में, ये बदमाशी नहीं, बालसुलभ चरित्र है।

कई बार कुछ बच्चों में अधिक चिड़चिड़ापन देखने को मिलता है। मनोवैज्ञानिक इसे एक बायॉलॉजिकल मेनिजम कहते हैं, जिसके जरिए हमारा शरीर तनाव वाली स्थिति का सामना करने के लिए तैयार होता है। इसमें बच्चा किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को अपने लिए खतरनाक मान लेता है। यह डर वास्तविक भी हो सकता है और काल्पनिक भी। इसका असर उसकी पढ़ाई या रोजमर्रा के दूसरे कामों पर पड़ने लगता है।

वैसे अपने लिए स्वार्थी होने में कुछ गलत नहीं। वनिस्पत इसमें कुछ सकारात्मक पहलू शामिल हों। खैर, बहुत कुछ छूूटा है उसे जीना है अब। वैसे ही करोना काल ने डराकर रखा है। काल किसे लील ले। उससे पहले अब एकाकीपन ने सिखाया कि खुशियां तुम्हारे हिस्से में भी हैं। ठहराव से स्वच्छ, निर्मल पानी भी कीचड़ बन जाता है। शुक्रिया कोरोना काल। जीवन का उम्दा ज्ञान तुमने दिया।

विवेकशील मनुष्य जाति सिर्र्र्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह स्वयं से परे अन्य लोगों की आवश्यकताओं की भी उतनी ही चिन्ता करती है, जितनी स्वयं की। प्रकृति के अधिकांश जीव सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही स्वयं को सीमित रखते हैं, अपनी एवं अपने बच्चों की उदरपूर्ति के अतिरिक्त उन्हें किसी अन्य की चिन्ता नहीं रहती, लेकिन मनुष्य स्वयं के साथ-साथ न सिर्फ अपने परिवार, बल्कि पूरे समाज को साथ लेकर चलता है एवं उनके हितों के प्रति चिन्तित रहता है।

ऐसी ही बातें तो कई सौ साल पहले बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी भी कह गए हैं – ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।’ परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं और दूसरों को कष्ट देने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं। परोपकार की भावना ही वास्तव में मनुष्य को ’मनुष्य’ बनाती है। कभी किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते समय चेहरे पर व्याप्त संतुष्टि के भाव से जिस असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, वह अवर्णनीय है।



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