Thursday, October 28, 2021

स्वाद का मक्का रिवाज का बाजरा

Must read

स्वाद का मक्का रिवाज का बाजरा

विज्ञान और विकास ने मिलकर जो राह दुनिया को दिखाई, वो आसान पर चमकदार लालच का रास्ता है। गांधी ने आवश्यकता और प्रकृति के संबंध के बारे में बात करते हुए चेताया था कि भोग का असंयम हमेशा अकल्याणकारी साबित होगा। आज मिट्टी और पसीने के रिश्ते पर बात करना गरीबी पर बात करना है। जबकि हमेशा से ऐसा नहीं था। मेहनतकशों के पसीने और उनके उपजाए अनाज ने सदियों तक सभ्यता का ताज अपने सिर पर उठाए रखा है। पर बाजार और मुनाफे के जोर ने खानपान से लेकर हमारी सांस्कृतिक सोच-समझ तक सब बदल कर रख दिया।

कमाल तो यह कि इस होड़ ने यह भी दिखा दिया कि यह रास्ता मानवीय जीवन और प्रकृति दोनों के ही खिलाफ है। अन्य बातों को छोड़ बात करें सिर्फ खानपान की तो हमारी स्थिति आज बुद्धू के घर लौट आने जैसी है। खानपान के बड़े अड्डे अब देसी खाने की बात कर रहे हैं। स्वाद का खांटीपन रिवाज में ही नहीं, सेहत से जुड़ी हिदायतों में भी तेजी से शामिल हो रहा है। चूल्हे पर पकी दाल, मिट्टी के तवे पर सिकी बाजरे, बेजड़ी या मक्के की रोटी और साथ में सिलबट्टे पर पिसी चटनी का स्वाद रेस्तरां और नए ‘फूड कल्चर’ में अहमियत पाने लगा है। पर एक बड़े बिगाड़ के बाद इतनी सी पैबंदी से बात बनेगी, ऐसा लगता नहीं है।

भारत की पैरवी पर संयुक्तराष्ट्र ने 2023 को बाजरे का साल घोषित किया है। बाजरे के बने ‘मुरुक्कू’ खिलाकर भारत ने अपना स्वाद तो चढ़ा दिया सब पर लेकिन फिलहाल जो संकट है उससे जूझने का कोई छोटा रास्ता नहीं है हमारे पास। हमें चिकित्सक चाहिए, तंत्र में चरित्र चाहिए और संकट की दस्तक सुनकर तुरंत खड़े होने वाले कान भी चाहिए। एक चिकित्सक जिन्होंने दवा की पर्ची पर पेड़ लगाने की सलाह लिखी, एक जिन्होंने बिगड़ते हालात में बेबस तंत्र की नाकामी लिखी। ऐसे अनगिनत लोग हैं जिन्हें जब-जब संवेदनाओं ने कचोटा तब-तब उन्होंने हिदायत दी, गुहार लगाई, नाराजगी जताई और कई बार हौसला भी भरपूर दिया।

जैविक युद्ध के हालात में हमें उस अदृश्य को हराना है जो हमारे जैव अंश की उस दीवार को लांघने से कतराता है जिनमें लड़ने का भरपूर माद्दा है। जिन झिल्लियों पर पोषण के पहरेदार हैं वहां विषाणुओं को मात जल्द मिलने का पैगाम होता है। ये हमारी नस्ल को बचाए रखने की कुदरती किलेबंदी है। ऐसे में हमारी परंपराओं, जंगलों, जीवों और धरती के साथ हिल-मिलकर रहने वाले आदिवासियों की अनदेखी और उन्हें पिछड़ा मानकर ओझल कर देने वाली व्यवस्था अब कह रही है कि जिन्होंने हजारों साल पुराने जिन बीजों और पद्धतियों को सहेजा है, वही अच्छे जीवन की तिजोरियां हैं। जीन में छेड़छाड़ कर तैयार संकर बीजों ने, रसायनों के छिड़काव ने मिट्टी, पानी और फसलों को बेजान कर दिया है। उनमें जहर घोल दिया है। किया धरा तो हम सबका, मगर धकेले गए वो जिन्होंने बिगाड़ में नहीं, संभाल में हिस्सा लिया हमेशा।

संयुक्तराष्ट्र की जुलाई 2020 में मूलवासियों के हकों को लेकर आई खास रिपोर्ट ने कहा कि दुनिया की छह फीसद इस आबादी में डर है, उदासी है, दुश्वारियां हैं जिन्हें हमने भुला दिया है और मुख्यधारा से धकेल दिया है। जो धकेले नहीं गए थे, उन्हें भी अब अंतरात्मा को झकझोर देने वाली महामारी से दो-दो हाथ करने के बाद अपने खाने में कई तब्दीलियां करनी होंगी। पोषण वाले तिरंगे और सतरंगे खाने की पैरवी सरकारी संस्थाएं करती रही हैं। अब इन्हें रोजमर्रा की आदत में शामिल करने का वक्त है। बीमारियों को उलटे पांव लौटा देने की ताकत भी यही हैं। वनवासियों के अचूक नुस्खों और देसी उपज को बाजार का ठप्पा मिलने लगा है लेकिन इससे उनकी उद्यमिता को कितना उठान मिला है, इसका आकलन भी किए जाने की जरूरत है।






Source link

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article