Wednesday, October 20, 2021

CM बनने के बाद भी मुलायम की सेहत का ध्यान रखते थे छोटे भाई, घर से भेजते थे दूध-घी

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यूपी के पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव के भाई अभय राम उनके लिए सैफई से गेहूं और दूध-घी भेजते रहते थे। उन्होंने बताया था कि वह लखनऊ आज भी घर से अनाज भेजते हैं।

मुलायम सिंह यादव ने कभी सोचा भी नहीं था कि वह राजनीति में आएंगे, लेकिन देखते ही देखते उन्होंने अखाड़े से सियासत तक का सफर तय किया। वह विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री तक बने। मुलायम के साथ उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव भी हर जगह मौजूद रहे, लेकिन उनके एक भाई ने खुद को राजनीति से अलग रखा और गांव में ही आगे का जीवन व्यतीत करने का फैसला किया।

राजनीति में क्यों नहीं गए अभय राम यादव: मुलायम ने छोटे भाई अभय राम यादव आज भी गांव में खेती करते हैं और खेत में हल चलता हैं। मुलायम के सीएम बनने के बाद भी वह कभी लखनऊ या दिल्ली रहने के लिए नहीं गए। अभय राम यादव से एक इंटरव्यू में जब पूछा गया कि वह लखनऊ क्यों नहीं गए तो उन्होंने कहा था, ‘सभी भाई राजनीति में चले जाएंगे तो घर कौन देखेगा? हम ज्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं। मुलायम ने पढ़ाई और अध्यापक बन गए थे। फिर उन्होंने राजनीति में कदम रखा।’

अभय राम यादव ने कहा था, ‘अगर हम राजनीति में चले जाते तो अनाज कौन पैदा करता? दूध-घी कौन पैदा करता? अगर मैं खेती न करूं तो परिवार का खाना-पीना इतना अच्छा नहीं हो पाएगा। सैफई से ही गेहूं, दूध-घी और चना लखनऊ के लिए जाता है। हम यहीं से अखिलेश, मुलायम सिंह और राजपाल के लिए यहीं से जाता है। राजपाल तो इटावा में रहता है तो उनके लिए वहीं भेज दिया जाता है।’

शिवपाल से अभी भी होती है मुलाकात: शिवपाल से मुलाकात के सवाल पर अभय राम यादव ने कहा, ‘हमारी किसी से कोई लड़ाई नहीं है। शिवपाल अक्सर हमसे मिलने के लिए आते हैं। अखिलेश से भी हमारी इस पर बात हुई थी। अखिलेश और राम गोपाल के कारण ही परिवार में लड़ाई हुई है। अखिलेश से भी हमारी कोई लड़ाई नहीं है और वो तो मुझे जसवंत नगर से टिकट देना चाहते थे। शिवपाल को जब ये लोग पूछते ही नहीं थे तो उन्होंने अलग मोर्चा बना लिया।’

बता दें, मुलायम सिंह यादव ने साल 1967 में जसवंत नगर से पहली बार चुनाव लड़ा था। इसके बाद वह कई बार इसी सीट से चुनाव जीते और जनता पार्टी की सरकार में सहकारिता मंत्री तक बने। उस दौरान कांग्रेस बड़ी पार्टी थी और जब मुलायम सिंह यादव ने पहली बार चुनाव लड़ने का फैसला किया तो कांग्रेस के नेता उन्हें ‘कल का छोकरा’ कहकर बुलाते थे।



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